मंगलवार, 2 जून 2015

जिन्दगी (कविता)

जिन्दगी भी एक अनुठा पहेली है
कभी खुशी तो कभी याद सहेली है
कभी उछलते है सुनहरे बागानों में
कभी दु:ख भरी यादें रूलाती है

अजब  उतार चढ़ाव आते रहते है
बचपना खेल-खेल में बित जाते हैं
भागमभाग जवानी में आ जाते हैं
कई उलझने मन में जगह बनाते हैं


मानसिक तनाव बढ़ने लगते हैं
एक दूसरे से मसरफ बिगड़ते हैं
लोग ईमानदारी से दूर भागते हैं
ईर्ष्या और द्वेष को गले लगाते है


जिन्दगी एक अनबुझ रास्ता है
इसे समझ पाना एक समस्या है
समझने में कड़ी मेहनत करते हैं
तब इस सफर को तय करते हैं


वाह रे जिन्दगी क्या रंग लाती है
बचपन में उमंग भर  देती है
जवानी में भाग-दौड़ ला देती है
और बुढापा में स्थिर कर देती है


यही है जिन्दगी का रहनुमा दस्तूर
हर पल को कर देता है क्षण भंगुर
कराता है सबको यही पर सफर
चाहे वो गाँव हो या शहर


यही है जिन्दगी की कहनी
जो कभी ला देता है रवानगी
और कभी ला देता है दीवानगी
सिखाता है सबको जिन्दगानी
-@रमेश कुमार सिंह
  १२-०५-२०१५

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